बाबुके प्यार

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बाबुके प्यार

बाबुके प्यार, एगो पुरान टाँर्च,
अपने अन्हारमे रहत ।
लेकिन हमरा रास्ता देखाबेमे,
रातभर जरत ।

बाबुके प्यार, एगो घरके छत,
जेकर नीचा गर्मीके कोनो असर न ।
अपने सुरजके सामना करे,
लेकिन हमरा उपर छाया पसारे ।

बाबुके प्यार, एगो पुरान लाठी,
जेकर सहारा बिना जिन्दगी लथपथ ।
सब रस्तापर साथ देलन,
अपन दुःख भुलाके, हमरा खड़ा रखलन ।

बाबुके प्यार, एगो खेतके हल,
जेकर बिना खेती नहोए पूरा ।
अपने चलत, पसीना बहाएत,
तब जाके घरमे अन्न–पानी आएत ।

बाबुके प्यार, एगो पुरान छाता,
हमरा अपना भितर रखत ।
अपने मेंघमे भिजत,
लेकिन हमरा मेंघसे बचाके रखत ।

कविको परिचय

कविः बिवेक प्रसाद कुशवाहा
कविको फोटोः Download
ठेगानाः मलंगवा–२, सर्लाही, मधेश प्रदेश, नेपाल
भाषाः बज्जिका
फोनः +977 976 877 1655
ईमेलः words@bibekkushwaha.com.np

अस्विकरण (Disclaimer)

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