सपना पुरा करे लागि दूर रहल लइका

सपना पुरा करे लागि दूर रहल लइका
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सपना पुरा करे लागि दूर रहल लइका

मायबाबूसे दूर रही छी,
छोट कोठरीमे अकेले सुती छी ।
सपनाके रस्ता काँटसे भरल हई,
लेकिन मनमे आशाके गहिर भार हई ।

रातभर निन्द न आबे,
मायके याद आँखसे पानी बहाबे ।
भातके स्वाद बिसरगेल छी,
मायके हातके रोटी मनमे बसगेल हए ।

दोस्तसब भी हए, लेकिन मन अकेले हए,
कोई नबुझे, ई मन केतेक दुःखमे हए ।
पढाइके बोझ, गरिबीको चोट,
सब सहके बढ़ रहल छी, सफलताके खोजीमे ।

कहिओ कहिओ मन करे सब छोडके,
घर जाके मायके काखमे रोई ।
लेकिन सपना कहत – “रुक, अभी न,
सफलता दुइए कदम दूर हई ।”

उ दिनके लागि रुकल छी, जब माय कहत,
“बेटा, तोहर सपना पुरा होगेल ।”
दुःख बुझ रहल छी, लेकिन कठोर बन रहल छी,
सपना पूरा करे लागि, चट्टान जइसन खड़ा छी ।

कविको परिचय

कविः बिवेक प्रसाद कुशवाहा
कविको फोटोः Download
ठेगानाः मलंगवा–२, सर्लाही, मधेश प्रदेश, नेपाल
भाषाः बज्जिका
फोनः +977 976 877 1655
ईमेलः words@bibekkushwaha.com.np

अस्विकरण (Disclaimer)

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