बदलैत मौसम के रंग

बदलैत मौसम के रंग
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कविता

कनकनी वाला जाढ़ अब भागे लागल,
कोहराके मोट चादर अब फाटे लागल ।
सुतल धरती अब धीरे–धीरे आँख खोलत,
नयाँ जीवनके रास्ता अब खुले लागत ।

आमके गाछीपर मंजरके भार,
वसन्त ऋतुके ई गजब बहार ।
मंजरके गन्धसे पुरा गाओ गमकल,
वसन्तके देखके मन बहकल ।

घैलाके पानी अब अमृत लागे,
गाछीके छाँवमे अब सुख जागे ।
पंखाके हावा अब गरम लागे,
छाँवके शरणमे सब कोई रहे ।

टिप–टिप बूंदसे भेल हरियाली,
किसानके चेहरापर आएल खुशहाली ।
गाँओ–सहरमे खुशीके हल्ला,
नया फसल अब जामे लागल ।

दसहरा–दिवालीके आहट आगेल,
गाँओ–सहरमे खुशीके उमंग छागेल ।
दीपसे जगमग ई अंगना–दुआर,
सुख–शान्ति लेके आएल ई त्योहार ।

कविको परिचय

कविः बिवेक प्रसाद कुशवाहा
कविको फोटोः Download
ठेगानाः मलंगवा–२, सर्लाही, मधेश प्रदेश, नेपाल
भाषाः बज्जिका
फोनः +977 976 877 1655
ईमेलः words@bibekkushwaha.com.np

अस्विकरण (Disclaimer)

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